Gram Panchayat Haminpur Pilani Jhunjhunu

Haminpur

Gram Panchayat

Major Piru Singh

राजस्थान का प्रथम परमवीर चक्र विजेता

हवलदार मेजर पीरू सिंह शेखावत
राजस्थान, झुंझुनू {1948} :- रणबांकुरों की धरती शेखावाटी का झुंझुनू जिला राजस्थान में ही नहीं, अपितु पूरे देश में बहादुरी में अपना खास स्थान रखता है। देश में सर्वाधिक सैनिक देने वाले झुंझुनू जिले की मिट्टी के कण-कण से वीरता टपकती है।
शूरा निपजे झुंझुनू, 
लिया कफन के साथ।
रण भूमि का लाड़ला, 
प्राण हथेली हाथ।। 


देश के खातिर स्वयं को उत्सर्ग कर देने की परम्परा यहां सदियों पुरानी है। मातृभूमि के लिए हंसते – हंसते मिट जाना यहां गर्व की बात है। झुंझुनू जिले के बेरी नामक छोटे से गाँव में सन 1917 में ठाकुर लालसिंह शेखावत के घर जन्मे पीरूसिंह शेखावत चार भायों में सबसे छोटे थे तथा ’राजपूताना राईफल्स’ की छठी बटालियन की ’डी’ कम्पनी के हवलदार मेजर थे। 
खेती के अतिरिक्त शिकार करने के तो वह बचपन से ही शौकीन रहे थे। अपने इस शौक़ के कारण वह कई बार घायल भी हुए थे।शिकार के शौक़ ने ही पीरू सिंह को सेना में आने और फौजी बनने के लिए प्रेरित किया था। 
1936 को पीरू सिंह ने फौज में कदम रखा। फौज में आने के बाद ही पीरू सिंह के चरित्र में आश्चर्यजनक बदलाव आया। स्कूल में उन्हें पढ़ाई से चिढ़ थी, लेकिन फौज में वह पढ़ाई की ओर से बेहद गंभीर सैनिक सिद्ध हुए ।अपनी शिक्षा के आधार पर,1940 को पीरू सिंह लांस नायक के रूप में पदोन्नत हो गए। 1943 में वह कम्पनी हवलदार मेजर बन गये। 
1947 के भारत- पाक विभाजन के बाद जब कश्मीर पर कबालियों ने हमला कर हमारी भूमि का कुछ हिस्सा दबा बैठे तो कश्मीर नरेश महाराजा हरि सिंह ने अपनी रियासत को भारत में विलय की घोषणा कर दी। इस पर भारत सरकर ने अपनी भूमि की रक्षार्थ वहां फौजें भेजी। इसी सिलसिले में राजपूताना राईफल्स की छठी बटालियन की ‘डी’ कम्पनी को भी टिथवाला के दक्षिण में तैनात किया गया। 5 नवम्बर, 1947 को हवाई जहाज से वहां पहुंचे। श्रीनगर की रक्षा करने के बाद उसी सेक्टर से कबायली हमलावरों को परे खदेडऩे में इस बटालियन ने बड़ा महत्त्वपूर्ण कार्य किया। मई 1948 में छठी राजपूत बटालियन ने उरी और टिथवाल क्षेत्र में झेलम नदी के दक्षिण में पीरखण्डी और लेडीगली जैसी प्रमुख पहाडिय़ों पर कब्जा करने में महत्त्वपूर्णयोगदान दिया। इन सभी कार्यवाहियों के दौरान पीरूसिंह ने अद्भुत नेतृत्व और साहस का परिचय दिया। जुलाई 1948 के दूसरे सप्ताह में जब दुश्मन का दबाव टिथवाल क्षेत्र में बढ़ने लगा तो छठी बटालियन को उरीक्षेत्र से टिथवाल क्षेत्र में भेजा गया। टिथवाल क्षेत्र की सुरक्षा का मुख्य केन्द्र दक्षिण में 9 किलोमीटर पर रिछमार गली था, जहाँ की सुरक्षा को निरन्तर खतरा बढ़ता जा रहा था।अत: टिथवाल पहुँचते ही राजपूताना राईफल्स को दारापाड़ी पहाड़ी की बन्नेवाल दारारिज पर से दुश्मन को हटाने का आदेश दिया था। यह स्थान पूर्णत: सुरक्षित था और ऊंची-ऊंची चट्टानों के कारण यहां तक पहुंचना कठिन था। जगह तंग होने से काफी कम संख्या में जवानों को यह कार्य सौंपा गया।18 जुलाई को छठी राजपूताना राइफल्स ने सुबह हमला किया, जिसका नेतृत्त्व पीरूसिंह कर रहे थे। दुश्मन ने बहुत सलीके से मीडियम मशीनगनें लगा कर अपनी रणनीति जमारखी थी और उसकी ओर से वह सब रास्ते निशाने पर थे, जिनके जरिए उन पर हमला बोला जा सकता था। दुश्मन के बंकरों से ग्रेनेड फेंके जा रहे थे। हवलदार मेजर कम्पनी की एकदम अग्रिम पंक्ति में आगे बढ़ रहे थे। पीरू सिंह नेदेखा कि उनकी आधे से ज्यादा टुकड़ी तबाह हो चुकी है, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पूरे जोश से युद्धनाद करते हुए उन्होंने अपने बचे हुए जवानों काहौसला बढ़ाया और तेजी से दुश्मन के निकटमत मीडियम मशीनगन दल की ओर बढ़ गए। फटते हुए ग्रेनेड की किर्चें पीरू सिंह के कपड़ों और शरीर को चीरते हुए निकलती जा रही थीं, लेकिन पीरू सिंह को इसकी जरा भी परवाह नहीं थी और वह अपनी हिफाजत की चिन्ता किए बगैर आगे बढ़ रहे थे। उनके शरीर से ख़ून बह रहा था, लेकिन उनका ध्यान इस ओर नहीं था। वह तो अपना सारा ध्यान बस लक्ष्य को पाने में लगा रहे थे। उन्होंने उत्तेजना से भरकर एक छलांग दुश्मन के उस मीडियम मशीनगन के दस्ते पर लगाई और बैनेट से भेदते हुए उन्हें मौत की नींद सुला दिया।
इसी समय पीरू सिंह को एहसास हुआ कि वह अपनी टुकड़ी में अकेले ही बचे हैं और एक मात्र योद्धा हैं। उनके शेष साथी या तो मौत की नींद सो गए हैं या बुरी तरह घायल हैं। अचानक एक ग्रेनेड आकर सीधे उनके चेहरे पर लगा। उनका चेहरा और आँखें ख़ून से भीग गईं। इसके बावजूद उन्होंने रेंगकर लुढ़कतेहुए, ग्रेनेड की पर���ाह किए बगैर दुश्मन की दूसरी पोजीशन की ओर कूच कर दिया। पीरू सिंह ने पूरे जोश से युद्ध घोष किया और दूसरी खाई में छिपे दुश्मनों पर भी संगीन से वार किया और दो सैनिकों को ठिकाने लगा दिया।उनके इस हमले का सारा नज़ारा उनकी 'सी' कम्पनी के कमाण्डर ने देखा, जो पीरू सिंह की कम्पनी की गोलीबारी में मदद कर रहा था। इसी घायल अवस्था में हवलदार पीरू सिंह दूसरी खाई से निकल कर दुश्मन के तीसरे बंकर की ओर बढ़े।
पीरूसिंह ने एक ग्रेनेड बंकर की तरफ फेंका इतने मे बंकर से निकली एक गोली पीरू सिंह के सर मे आ लगी । यकायक धमाके की आवाज आई, जिससे पता चला कि पीरू सिंह का ग्रेनेड अपना काम कर गया और दुश्मन के बंकर के परखच्चे उड गये । लेकिन पीरू सिंह ने भी प्राण त्याग दिये ।
पीरूसिंह को इस वीरता पूर्ण कार्य पर भारत सरकार ने मरणोपरान्त ‘परमवीर चक्र’ प्रदानकर उनकी बहादुर का सम्मान किया। अविवाहित पीरूसिंह शेखावत की ओर से यह सम्मान उनकी माँ ने राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से हाथों ग्रहण किया। परमवीर चक्र से सम्मानित होने वाले मेजर पीरूसिंह शेखावत राजस्थान के पहले व भारत के दूसरे बहादुर सैनिक थे। राजस्थान के कवियो ने ठीक ही कहा है:- 
टिथवाल री घाटियां, 
विकट पहाड़ा जंग । 
शेखो कियो अद्भुत समर , 
रंग पीरू ती रंग ।।

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